Sunday, July 3, 2011

कान पर न तान


कानों में हेडफोन लगाए म्यूजिक की मस्ती में मस्त यंगस्टर्स आजकल कहीं भी नजर जाते हैं , लेकिन लंबे समय तक ऐसा करना कानों के लिए काफी नुकसानदायक हो सकता है , इतना नुकसानदायक कि धीरे - धीरे इससे सुनने की क्षमता में कमी आती जाती है। कानों से संबंधित ऐसी ही कुछ और समस्याओं और उनका हल एक्सर्पट्स से बात करके बता रहे हैं प्रभात गौड़ :


कैसे काम करता है कान
कान के तीन हिस्से होते हैं। आउटर ईयर , मिडल ईयर और इनर ईयर। आउटर ईयर वातावरण से ध्वनि तरंगों के रूप में आवाजों को ग्रहण करता है। ये तरंगें कैनाल से होती हुई ईयरड्रम तक पहुंचती हैं और इनकी वजह से ईयरड्रम वाइब्रेट करने लगता है। इस वाइब्रेशन से मिडल ईयर में मौजूद तीन बेहद छोटी हड्डियों में गति जाती है और इस गति के कारण कान के अंदरूनी हिस्से में मौजूद दव हिलना शुरू होता है। इनर ईयर में कुछ हेयर सेल्स होते हैं , जो इस दव की गति से थोड़ा मुड़ जाते हैं और इलेक्ट्रिक पल्स के रूप में सिग्नल दिमाग को भेज देते हैं।

दो तरह का लॉस
हियरिंग लॉस दो तरह का हो सकता है। पहला है कंडक्टिव हियरिंग लॉस , जो कान के बाहरी और बीच के हिस्से में आई किसी समस्या की वजह से होता है। इसे बीमारी की वजह से होने वाला बहरापन भी कह सकते हैं , जबकि दूसरी तरह की समस्या सेंसरीन्यूरल हियरिंग लॉस कान के अंदरूनी हिस्से में आई किसी गड़बड़ी की वजह से होती है। ऐसा तब होता है , जब हेयर सेल्स नष्ट होने लगते हैं या ठीक से काम नहीं करते। दरअसल , कान में तकरीबन 15 हजार स्पेशल हियरिंग हेयर सेल्स होते हैं। इनके बाद नर्व्स होती हैं।

हेयर सेल्स को नर्व्स की शुरुआत कहा जा सकता है। इन्हीं की वजह से हम सुन पाते हैं , लेकिन उम्र बढ़ने के साथ - साथ ये सेल्स नष्ट होने लगते हैं , जिससे नर्व्स भी कमजोर पड़ जाती हैं और हमारे सुनने की शक्ति कम होती जाती है। उम्र बढ़ने के अलावा और भी कई वजहें हैं , जिनसे ये सेल्स नष्ट होती जाती हैं। कुछ खास तरह की दवाओं और कुछ बीमारियों जैसे डायबीटीज और हॉर्मोंस के असंतुलन की वजह से भी कान के सुनने की क्षमता में कमी जाती है। इसके अलावा तेज आवाज भी इन सेल्स के लिए नुकसानदायक होती है। जब तक हमें यह पता चलता है कि हमें वाकई सुनने में कोई दिक्कत हो रही है , तब तक हमारे 30 फीसदी सेल्स नष्ट हो चुके होते हैं। एक बार नष्ट हुए सेल्स फिर ठीक नहीं होते। वे हमेशा के लिए नष्ट हो जाते हैं।

सुनाई कम देने के लक्षण
सुनने की क्षमता में कमी आने के शुरुआती लक्षण बहुत साफ नहीं होते , लेकिन यहां ध्यान देने की बात यह है कि सुनने की क्षमता में आई कमी वक्त के साथ धीरे - धीरे और कम होती जाती है। ऐसे में जितना जल्दी हो सके , इसका इलाज करा लेना चाहिए। नीचे दिए गए लक्षण हैं तो डॉक्टर से जरूर मिलना चाहिए।

- सामान्य बातचीत सुनने में दिक्कत होना , खासकर उस जगह जहां बैकग्राउंड में शोर है।

- बातचीत में बार - बार लोगों से पूछना कि उन्होंने क्या कहा।

- फोन पर सुनने में दिक्कत होना।

- बाकी लोगों के मुकाबले ज्यादा तेज आवाज में टीवी या म्यूजिक सुनना।

- नेचरल आवाजों को सुन पाना मसलन , बारिश की आवाज और पक्षियों के चहचहाने की आवाज आदि।

सुनने की क्षमता में कमी की वजह
- सुनने की क्षमता में कमी पैदायशी हो सकती है।

- कानों से पस बहना , इन्फेक्शन या कानों की हड्डी में कोई गड़बड़ी सुनने की क्षमता को कम कर सकती है।

- कान के पर्दे का डैमेज हो जाना सुनने की क्षमता को प्रभावित करता है।

- उम्र भी एक वजह है , जिसमें कान की नर्व्स कमजोर हो जाती हैं।

इलाज
- अगर छह महीने का बच्चा आवाज की तरफ रेस्पॉन्स नहीं देता तो उसे डॉक्टर को दिखाना चाहिए। हो सकता है उसे जन्मजात बहरेपन की शिकायत हो। ऐसे मामलों में डॉक्टर सर्जरी कराने की सलाह देते हैं।

- इन्फेक्शन की वजह से सुनने की क्षमता में कमी आई है , तो इसे दवाओं से ठीक किया जा सकता है।

- अगर पर्दा डैमेज हो गया है , तो सर्जरी करनी पड़ती है। कई बार पर्दा डैमेज होने का इलाज भी दवाओं से ही हो जाता है।

- नर्व्स में आई किसी कमी की वजह से सुनने की क्षमता में कमी आई हो तो जो नुकसान नर्व्स का हो गया है , उसे किसी भी तरह वापस नहीं लाया जा सकता। ऐसे में एक ही तरीका है कि हियरिंग एड्स का इस्तेमाल किया जाए। हियरिंग एड्स दिक्कत को आगे बढ़ने से भी रोकता है और उस वक्त तो फायदा पहुंचाता ही है। ऐसी हालत में आप हियरिंग एड्स का यूज नहीं करते , तो कानों की नर्व्स पर स्ट्रेन बढ़ता है और समस्या बढ़ती जाती है।

कान की मशीन
अगर कान का पर्दा फट गया है और सुनाई नहीं देता , तो भी डॉक्टर हियरिंग एड्स यानी कान की मशीन लगा सकते हैं। इससे सुनाई देने लगता है , लेकिन आमतौर पर डॉक्टर ऐसा नहीं करते। डॉक्टर ऐसी स्थिति में सर्जरी कराने की ही सलाह देते हैं क्योंकि कान की मशीन लगाने से कान की समस्या जहां की तहां बनी रहती है , जबकि सर्जरी से उसे ठीक कर दिया जाता है। अगर कान से डिस्चार्ज हो रहा है तो किसी भी हालत में कान में मशीन लगाने की सलाह नहीं दी जाती। अलग - अलग तरह की कान की मशीनें आजकल बाजार में हैं। ये मोटे तौर पर दो तरह की हैं :

एनालॉग : कान की इन मशीनों को काफी समय पहले यूज किया जाता था। अब इनका इस्तेमाल मोटे तौर पर बंद हो गया है। कंपनियां भी अब इन्हें नहीं बनातीं। एनालॉग मशीनों में वातावरण की आवाजें पूरी - की - पूरी अंदर कान में जाती हैं , जिससे सुनने वाले को असली आवाज सुनने में दिक्कत होती है। यानी गैरजरूरी साउंड को कंट्रोल करने की ताकत इनमें नहीं होती , इसीलिए अब इन्हें यूज नहीं किया जाता।

डिजिटल : कान की इन मशीनों में खूबी यह होती है कि ये पूरी तरह प्रोग्राम्ड होती हैं और गैरजरूरी आवाज को कंट्रोल कर लेती हैं। बाहरी शोर भी कंट्रोल होता रहता है। मतलब इनकी मदद से आवाज ज्यादा साफ सुनाई देती है। इनसे संतुष्टि भी ज्यादा होती है। इनकी कीमत 10 हजार रुपये से शुरू होती है। जिस दिन डॉक्टर इन्हें लगाते हैं , उसके 10 दिन बाद मरीज को दोबारा बुलाया जाता है। ऐसा इसलिए किया जाता है कि अगर मशीन की प्रोग्रामिंग से मरीज को कोई दिक्कत महसूस हो रही हो तो डॉक्टर उसे ठीक कर देते हैं।

जहां तक आकार की बात है तो कान की मशीनें चार तरह के मॉडल्स में हो सकती हैं ये हैं : पॉकेट मॉडल , कान के पीछे लगाई जाने वाली , कान के अंदर लगाई जाने वाली और एक नई तरह की मशीन भी गई है , जिसे चश्मे के साथ लगाया जाता है। चारों तरह की मशीनें एनालॉग और डिजिटल दोनों कैटिगरी में उपलब्ध हैं। कान के अंदर लगाई जानेवाली मशीनें दिखाई नहीं देती , लेकिन लोगों को दिखने , दिखने के चक्कर में नहीं फंसाना चाहिए। जब आंखों के लिए चश्मा का यूज कर सकते हैं तो कानों के लिए मशीन का इस्तेमाल करने में भी शर्म की कोई जरूरत नहीं है।

कीमत : अच्छी क्वॉलिटी की डिजिटल मशीन ( सिंगल ) 15 से 20 हजार रुपये तक जाती है। वैसे , मार्केट में एक लाख रुपये तक की मशीनें मौजूद हैं। एनालॉग मशीन ( सिंगल ) की कीमत 3 से 10 हजार रुपये के बीच होती है।

आईपॉड सुनते वक्त रखें ध्यान
- आईपॉड या एमपी 3 प्लेयर को हेडफोन या ईयरबड्स की मदद से जरूरत से ज्यादा आवाज पर और लगातार लंबे वक्त तक सुनना कानों के सुनने की क्षमता को प्रभावित कर सकता है। आजकल हियरिंग लॉस की यह एक बड़ी और महत्वपूर्ण वजह है। मेट्रो में म्यूजिक सुनने वाले यंगस्टर्स को मेट्रो के शोर के चलते आमतौर पर आवाज ज्यादा तेज रखनी पड़ती है। म्यूजिक सुनते वक्त हमारे कानों को होने वाला नुकसान इस बात पर तो निर्भर करता ही है कि हम कितनी तेज आवाज में म्यूजिक सुन रहे हैं , इस पर भी निर्भर करता है कि हम कितनी देर तक ऐसा कर रहे हैं।

- म्यूजिक सुनते वक्त वॉल्यूम हमेशा मीडियम या लो लेवल पर ही रखें , लेकिन कई बार बाहर के शोर के चलते आवाज तेज करनी पड़ती है। तेज आवाज में सुनने से कानों को नुकसान हो सकता है इसलिए शोरगुल वाली जगहों के लिए शोर को खत्म करने वाले ईयरफोन का इस्तेमाल कर सकते हैं , लेकिन आवाज कम ही रखें। हालांकि ऐसे हेडफोन या ईयरफोन थोड़े महंगे हो सकते हैं।

- कितनी आवाज कितनी देर तक सुनना ठीक है , इसके लिए 60/60 नियम फॉलो कर सकते हैं। इसमें आईपॉड को 60 मिनट के लिए उसके मैक्सिमम वॉल्यूम के 60 फीसदी पर सुनें और फिर ब्रेक लें। ब्रेक लेने से कानों को आराम मिल जाता है और कानों को नुकसान कम होता है।

- आईपॉड को फुल वॉल्यूम पर रोजाना 5 मिनट से ज्यादा सुनना सही नहीं है और अगर 10 से 50 फीसदी तक वॉल्यूम पर सुन रहे हैं , तो सुनने की कोई लिमिट नहीं है। इसे आप कितनी भी देर सुन सकते हैं। उससे कानों को नुकसान नहीं होता।

- म्यूजिक सुनने के लिए ईयरबड्स भी आती हैं और हेडफोंस भी। ईयरबड्स की बजाय हमेशा हेडफोन का इस्तेमाल करें। हेडफोन को चूंकि कान के ऊपर लगाया जाता है और ईयरबड्स को कान के अंदर , इसलिए हेडफोन , ईयरबड की तुलना में कान को कम नुकसान पहुंचाते हैं। ईयरबड्स हेडफोन के मुकाबले नौ डेसिबल ज्यादा आवाज देते हैं। अगर आप 60 डेसिबल के आसपास म्यूजिक सुन रहे हैं , तब तो यह कोई बड़ी बात नहीं है , लेकिन जैसे ही वॉल्यूम 70 या 80 डेसिबल पहुंचता है तो इस थोड़े से अंतर से ही कानों को काफी नुकसान हो सकता है।

- कभी - कभी ऐसा मन हो सकता है कि आईपॉड को फुल वॉल्यूम पर सुना जाए , लेकिन ऐसा कभी करें। पांच मिनट से ज्यादा फुल वॉल्यूम पर सुनने पर कान को नुकसान हो सकता है।

- इसके अलावा ऐसे लोग जो काफी शोरगुल वाली जगह पर रहते हैं , उनकी हेयर सेल्स भी डैमेज हो सकती हैं। शॉर्ट टर्म में उनके सुनने की क्षमता प्रभावित हो सकती है। मसलन , अगर कोई एक घंटे के लिए किसी लाउडस्पीकर के पास खड़ा हो और उसके फौरन बाद उसका टेस्ट किया जाए तो सुनने की क्षमता में काफी कमी सकती है , लेकिन यही चीज अगर वह लगातार करता रहे , मतलब रोजाना एक घंटे के लिए ऐसा करे तो उसकी सुनने की क्षमता हमेशा के लिए जा सकती है।

- इसी तरह जिन लोगों का काम ही ऐसा है , जिन्हें 7-8 घंटे तक फोन पर बात करनी पड़ती है , उन्हें भी कानों का रिस्क हो सकता है। इसमें आमतौर पर कॉल सेंटर आदि में काम करने वाले लोग आते हैं। ऐसे लोगों को भी रेग्युलर चेकअप कराते रहना चाहिए।

- फैक्ट्री की आवाज या जेनरेटर की आवाज भी कानों के लिए नुकसानदायक हो सकती है।
वॉल्यूम
प्रतिदिन सुनने का अधिकतम समय
50%
कोई सीमा नहीं
60%
18 घंटे
70%
साढ़े चार घंटे
80%
करीब डेढ़ घंटा
90%

करीब 18 मिनट
100%

करीब 5 मिनट


किसकी कितनी तेज आवाज
फुसफुसाने की आवाज
30 डीबी
सामान्य बातचीत 60
डीबी
वॉशिंग मशीन की आवाज
70 डीबी
कार का इंजन
70 डीबी
एमपी 3 ( अधिकतम आवाज )
105 डीबी
पटाखे की आवाज
150 डीबी

यहां बता दें कि जब भी डेसिबल में 10 की बढ़ोतरी होगी , आवाज में 10 गुना तेजी जाएगी। जैसे सामान्य बातचीत के मुकाबले कार का इंजन 10 गुना आवाज देता है।

वैक्स है तो क्या करें
स्वस्थ कान वैक्स पैदा करते हैं। वैक्स कानों के लिए एक तरह के सुरक्षा कवच का काम करती है। ऐसे में जब तक दर्द , चिड़चिड़ापन या कोई और दिक्कत हो , तब तक वैक्स को लेकर कोई टेंशन नहीं लेनी चाहिए। दरअसल , वैक्स कान को बचाता है। बाहर की गंदगी को अंदर जाने से रोकता है। कान के बाल भी यही काम करते हैं। अगर कभी यही वैक्स ज्यादा बन रहा है तो वह धीरे - धीरे कान के अंदर जमा होने लगता है और कान की कैनाल को ब्लॉक कर देता है। इससे कान बंद हो जाता है और भारी - भारी लगने लगता है। कई बार सुनने में भी दिक्कत होने लगती है। ऐसे में सलाह यह है कि कान में कभी भी ईयरबड डालें। इससे पर्दा डैमेज होने का खतरा होता है। ऐसे वैक्स को हटाने के लिए अपने ईएनटी विशेषज्ञ के पास जाएं और उनकी सलाह के मुताबिक काम करें। कान में तेल आदि डालें। कई बार लोग ऐहतियातन आतनकान में तेल डाल लेते हैं , जो गलत है। हालांकि वयस्क लोग अगर कान के बाहरी हिस्से की सफाई निश्चित अंतराल पर खुद ही करते रहें , तो वैक्स जमा नहीं होगा क्योंकि वैक्स आमतौर पर कान के बाहरी हिस्से में ही पैदा होता है।

कान के अंदर पानी चला जाना आम बात है , लेकिन अगर कभी ऐसा हो जाता है , तो पानी को जल्दी - से - जल्दी निकाल दें। इस काम में ईयरबड की मदद ले सकते हैं। पानी से कान को नुकसान हो सकता है। अगर पानी खुद नहीं निकाल पा रहे हैं , तो अपने डॉक्टर से मिलें। अगर कान की कोई समस्या है तो ज्यादा स्विमिंग करने से नुकसान हो सकता है। ऐसे में स्विमिंग से बचना ही अच्छा है। वैसे स्विमिंग करते वक्त कानों में ईयरप्लग लगाने चाहिए। इससे कानों को नुकसान पहुंचने की आशंका काफी कम हो जाती है।

रेग्युलर चेकअप
अगर आपकी उम्र 30 से 45 साल के बीच है और आपको लगता है कि आपकी सुनने की क्षमता ठीक है , तो दो साल में एक बार कानों का चेकअप करा लें। 50 साल की उम्र के आसपास कान की नसें कमजोर होने की शिकायत हो सकती है , इसलिए 50 साल की उम्र के बाद साल में एक बार कानों का चेकअप करा लें। चेकअप के लिए अगर आप ईएनटी विशेषज्ञ के पास जा रहे हैं तो वह आपके कान के पर्दे आदि की जांच करेगा , लेकिन कान की सेंसिटिविटी और उसके सुनने के टेस्ट के लिए ऑडियॉलजिस्ट के पास भी जा सकते हैं। वैसे बेहतर यही है कि कान की जांच के लिए ईएनटी विशेषज्ञ के पास ही जाएं। पूरी जांच के बाद अगर ईएनटी एक्सपर्ट को जरूरत महसूस होगी तो वह आपको ऑडियॉलजिस्ट के पास जाने को कह सकता है।

एक्सर्पट्स पैनल
डॉ . अरुण कुमार अग्रवाल , ईएनटी सर्जन , मौलाना आजाद मेडिकल कॉलेज
डॉ . टी . के . मजूमदार , ईएनटी सर्जन , सुंदर लाल जैन हॉस्पिटल
डॉ . मानसी माथुर , ऑडियॉलजिस्ट , एनएचसी हियरिंग केयर इंडिया

Sunday, January 30, 2011

शादी करने वाले रहते हैं ज्यादा फिट


अगर आप किसी से प्यार करते हैं और हमेशा फिट रहना चाहते हैं तो जल्दी से अपने प्यार का इजहार कर शादी की तैयारी कर लें। क्योंकि वैज्ञानिकों
का कहना है कि शादीशुदा कपल सिंगल लोगों की तुलना में ज्यादा फिट रहते हैं।

यूके की कार्डिफ यूनिवर्सिटी की इस रिसर्च के मुताबिक शादीशुदा आदमी जहां फिजिकली फिट रहते हैं वहीं शादीशुदा महिलाएं दिमागी तौर पर संतुष्ट रहती हैं और समय के साथ आपका ये हेल्थ पैकेज बढ़ता ही जाता हैं।

रिसर्च की मानें तो शादीशुदा पुरूषों के फिजिकली फिट रहने का राज है उनकी बीवीयां, जो उनके हेल्दी लाइफ स्टाइल के लिए जिम्मेदार होती हैं। वहीं औरतों के बारे में बात करें तो शादी के बाद वो अपनी मैरिड लाइफ में अपनी वैल्यू समझती हैं जिससे वो इमोशनली फिट रहने लगती हैं। डेविड ग्लेचर और जॉन ग्लेचर की इस स्टडी में कहा गया है कि प्यार एक समुद्री खोज की तरह है जिससे इंसान पूरी तरह रोमांस में भीग जाता है और आपको एक दूसरे के और करीब लाता है।

स्टडी के अनुसार क्योंकि शादी में दो इंसान एक दूसरे के साथ रहते हैं, कमिटमेंट करते हैं और काफी लंबा रिश्ता शेयर करते हैं और यही वजह है कि ऐसे जोड़े ज्यादा फिजिकली और मेंटली फिट रहते हैं।

फिजिकली हेल्थ की बात की जाए तो शादीशुदा पुरूष महिलाओं से ज्यादा भागयशाली होते हैं वहीं अगर मेंटल हेल्थ की बात की जाए तो शादीशुदा महिलाएं पुरुषों से ज्यादा फिट रहती हैं। शादी के बाद पार्टनर का आपके लाइफ स्टाइल को लेकर पॉजिटिव रहना आपके लिए एक हेल्थ प्रीमियम है। वहीं रिश्ते में हस्बंड के द्वारा अपनी वाइफ को ज्यादा महत्व देना उनके लिए मेंटल बोनस साबित हो सकता है।

लेखक के अनुभवों के आधार पर टीनएजर्स में रोमांस उन्हें डिप्रेशन की ओर ले जाता है और आगे चलकर उनके सेहत पर बुरा असर पड़ता है । जबकि टीन ऐज के बाद प्यार में इस तरह की कोई भी परेशानी पेश नहीं आती है।

इसलिए समर्पित प्यार के लिए मेच्योरिटी बहुत जरुरी है। इस लिहाज से महिलाओं में रिलेशनशिप के लिए सही उम्र 19 से 25 साल के बीच होनी चाहिए तो वही पुरुषों के लिए 25 के बाद ही ऐसे रिलेशनशिप को तरजीह देना चाहिए।

लेखक के अनुसार तनाव भरे संबंध से कही अच्छा है कि आप अकेले रहें। संबंधों में अलगाव काफी तकलीफदेह होता है पर पुरुषों के मुकाबले महिलाओं पर इसका कम ही असर पड़ता है।क्योकि उनके साथ अच्छा सोशल नेटवर्क होता है। संबंधों के असफल होने से सेहत पर बुरा असर पड़ सकता है।

Saturday, January 22, 2011

पेट बाहर निकल रहा है



मेरी उम्र 23 साल और हाइट 5 फीट 3 इंच है। मेरा पेट बाहर निकल रहा है। मैं अपनी टमी को कंट्रोल करना चाहती हूं। कोई ऐसी एक्सर्साइज बता दीजिए, जिससे मैं घर ही टमी कंट्रोल कर सकूं, क्योंकि मैं जिम नहीं जा सकती। साथ ही डाइट कंट्रोल के बारे में भी बता दीजिए?

टमी कंट्रोल करने के लिए आपको कुछ कार्डियो एक्सर्साइज जैसे साइकिलिंग, ट्रेडमिल, क्रॉस ट्रेनिंग करनी होगी। हालांकि इससे पहले वॉर्म अप के लिए आपको हलकी-फुलकी एक्सर्साइज करनी होगी। मसलन आप 15 से 20 मिनट रस्सी कूद सकती हैं। इसके बाद आप पेट की एक्सर्साइज शुरू कर सकती हैं। ध्यान रखें कि हर सेट के बाद कुछ सेकंड का ब्रेक जरूर लें।

लेगरीज: 8 से 12 बार (3 सेट)
अब्डॉमिनल क्रंचेज: 8 से 12 बार (3 सेट)
साइड कर्ल्स : 8 से 12 बार (3 सेट)

लेगरीज: कमर के बल सीधे लेटकर अपने दोनों पैरों को 90 डिग्री पर सीधा उठाइए और उसके बाद उन्हें वापस जमीन तक ले जाइए। ध्यान रहे कि इस दौरान आपके पैर जमीन को टच नहीं करें और आप उन्हें दोबारा ऊपर उठा लें। इस तरह अपनी कपैसिटी के मुताबिक 8 से 12 बार करें।

अब्डॉमिनल क्रंचेज: जमीन पर कम के बल सीधे लेटें और अपने दोनों पैरों को कैंची की तरह मोड़ लें। उसके बाद अपने दोनों हाथों को सिर के पीछे ले जाएं। हाथों के सपोर्ट से बॉडी को ऊपर उठाएं और दोनों कुहनियों को घुटनों से टच करें। कोहनी को घुटनों से टच करते वक्त सांस खींचें और वापस आते वक्त सांस छोड़ें। ऐसा 8 से 12 बार करें।

अगर आप अपनी टमी के फैट से परेशान हैं तो इससे निजात पाना भी आसान है। बैली डांस आपके लिए एक बेहतरीन ऑप्शन हो सकता है। इससे आप 1 घंटे में करीब 300 कैलोरी तक बर्न कर सकते हैं। जानते हैं इस डांस के बारे में :

टमी को फिट रखने के लिए आजकल बैली डांस काफी पॉपुलर हो रहा है। इस डांस के दौरान टमी कई डायरेक्शन में मूव करती है, जिससे फैट कम होने में आसानी मिलती है। पहले, यह डांस केवल प्रफेशनल लोगों तक ही सीमित था लेकिन अब फिटनेस बनाए रखने के लिए लोग इसका खूब इस्तेमाल कर रहे हैं। दरअसल, बैली डांस एक कार्डियो वसक्युलर एक्सरसाइज है। अगर आप इसकी रोजाना एक घंटे प्रैक्टिस करते हैं, तो 200 से लेकर 300 कैलरीज तक बर्न कर सकते हैं। लेकिन हां, तब यह ज्यादा असरदार होगा, जब इसके साथ बैलेंस डाइट अपनाकर चलें।

रखें इन बातों का ध्यान
- डांस शुरू करने से पहले रिसर्च कर लें और तरीकों को अच्छी तरह समझ लें।
- ये डांस आप ट्रेनर से भी सीख सकते हैं जो शुरुआत में आपके लिए बेहतर होगा।
- अपने रूटीन में बिना किया आलस के इसके लिए समय तय करना ठीक होगा।
- डांस शुरू करने से पहले हल्का फुल्का कुछ खा लें। दरअसल, इस डांस को करने के लिए बेहद एनर्जी की जरूरत होती है, इसलिए अगर आप कुछ खा पी लेंगे, तो लंबे समय तक इसे कर पाएंगे।
- डांस की शुरुआत स्लो रखें। एक बार मसल्स लचीली हो जाएं, तो उसके बाद इसे स्पीड में कर सकते हैं।
- अपने आर्म्स व लेग को मूव करते रहें और अपने पांवों को जमीन से ऊपर की तरफ अधिक से अधिक उठाएं।
- लगातार प्रैक्टिस से आप कुछ ही दिन में इसमें परफेक्ट हो जाते हैं। क्लास खत्म होने के बाद भी इसकी प्रैक्टिस करते रहें।
- शीशे के सामने डांस करने से यह पता चल पाएगा कि आप इस दौरान कितने फ्लैक्सिबल हो पा रहे हैं।
- केवल एक्सरसाइज करने से ही कुछ नहीं होने वाला। इसके साथ न्यूट्रिशस डाइट भी लें।
- अपने वेट और मसल्स फैट को चेक करते रहें। अगर लगता है आप शेप में हैं , तब आपको अपने मसल्स फैट को देखकर उसे टोन करवाना जरूरी है।

Tuesday, December 21, 2010

4 नहीं, बस 2 ही आंखें

' मिस्टर चश्मुद्दीन' को यों तो चश्मे से कोई खास दिक्कत नहीं थी, लेकिन जब कभी ब्लूलाइन में चढ़ने की बारी आती या किसी से झगड़ा हो जाता या फिर आर्मी, एयर फोर्स का कोई फिजिकल टेस्ट पास करना होता, तो जरूर उन्हें अपनी ये दो एक्स्ट्रा आंखें दुश्मन दिखाई देतीं। आखिर 'मिस्टर चश्मुद्दीन' ने चश्मे से छुटकारा पाने का फैसला किया और सर्जरी कराकर अपनी इन दो एक्स्ट्रा आंखों को बाय-बाय कह दिया। चश्मा हटाने के कौन-कौन से तरीके इन दिनों उपलब्ध हैं? इन पर कितना खर्च आता है और इनमें रिस्क क्या हैं? ऐसे ही तमाम सवालों के जवाब एक्सपर्ट्स की मदद से तलाशे प्रभात गौड़ ने :

हमारी आंखें
चश्मा हटाने के बारे में जानने से पहले हमें यह समझना होगा कि आंख काम कैसे करती है और नजर कैसे कमजोर होती है।

कैसे काम करती है आंख : आंख जब किसी चीज को देखती है तो उस चीज से रिफ्लेक्ट होनेवाली रोशनी आंख की कॉनिर्या के पीछे मौजूद नैचरल लेंस से गुजरकर रेटिना पर फोकस होती है। रेटिना नर्व्स का बना होता है और सामान्य आंख में इसी पर आकर उस चीज की इमेज बनती है। इसके बाद ये र्नव्स उस इमेज के संकेत दिमाग को भेज देती हैं और दिमाग चीज को पहचान लेता है।

नॉर्मल आंख : जब किसी चीज की इमेज सीधे रेटिना पर बनती है, तो हम उस चीज को साफ-साफ देख पाते हैं और माना जाता है कि नजर ठीक है।

मायोपिया या निकट दृष्टि दोष : जब कभी चीज की इमेज रेटिना पर न बनकर, उससे पहले ही बन जाती है तो चीज धुंधला दिखाई देने लगती हैं। इस स्थिति को मायोपिया कहा जाता है। इसमें आमतौर पर दूर की चीजें धुंधली दिखाई देती हैं। चश्मा या कॉन्टैक्ट लेंस लगाकर इस स्थिति में सुधार किया जाता है। मायोपिया कई मामलों में शुरुआती छोटी उम्र में भी हो सकता है। यानी 6 साल के आसपास भी मायोपिया आ सकता है।

चश्मा हटाने के तरीके

कॉन्टैक्ट लेंस
चश्मा हटाने के लिए कॉन्टैक्ट लेंस का ऑप्शन काफी पुराना है, जिसमें किसी सर्जरी की जरूरत नहीं होती। बेहद पतली प्लास्टिक के बने कॉन्टैक्ट लेंस आंख की पुतली पर मरीज खुद ही लगा लेता है और रात को सोते वक्त उन्हें उतार देता है। ये लेंस कर्वी होते हैं और आंख की पुतली पर आसानी से फिट हो जाते हैं। कितने नंबर का लेंस लगाना है, कैसे लगाना है और देखभाल कैसे करनी है, ये सब बातें डॉक्टर मरीज को समझा देते हैं। बाहर से देखकर कोई अंदाजा नहीं लगा सकता कि आंखों में लेंस लगे हैं या नहीं।

कॉन्टैक्ट लेंस दो तरह के होते हैं - रिजिड और सॉफ्ट। जिस लेंस की जितनी ऑक्सिजन परमिएबिलिटी (अपने अंदर से ऑक्सिजन को पास होने देने की क्षमता) होगी, वह उतनी ही अच्छा होगा।

कॉन्टैक्ट लेंस के मामले में सबसे महत्वपूर्ण है इसकी देखभाल। इन्हें साफ, सूखा और इन्फेक्शन से बचा कर रखना जरूरी है। कभी बाहर की चीजें और कभी आंख के आंसुओं आदि की वजह से कॉन्टैक्ट लेंस पर कुछ जमा हो जाता है। ऐसे में लेंसों को पहनने से पहले और निकालने के बाद हाथ की हथेली पर रखकर उनके साथ दिए गए सल्यूशन से साफ करना जरूरी होता है। सल्यूशन नहीं है, तो लेंस को पानी आदि से साफ करने की कोशिश न करें। बिना सल्यूशन के लेंस खराब हो सकता है। सल्यूशन आपके पास होना ही चाहिए।

कॉन्टैक्ट लेंस लगाने के शुरुआती दिनों में थोड़ी दिक्कत हो सकती है, लेकिन आदत पड़ जाने पर इनका पता भी नहीं चलता।

एक बार लेंस लेने के बाद डॉक्टर से रुटीन चेकअप कराते रहना चाहिए। डॉक्टर की सलाह के मुताबिक इन लेंसों को बदलते भी रहना चाहिए।

जिन लोगों की आंखें ड्राई रहती हैं या ज्यादा सेंसिटिव हैं या फिर किसी तरह की कोई एलर्जी है, उन्हें कॉन्टैक्ट लेंस पहनने की सलाह नहीं दी जाती।

अगर साफ-सफाई का ध्यान रखा जाए और डॉक्टर के कहे मुताबिक लेंस का इस्तेमाल किया जाए तो कॉन्टैक्ट लेंसों का कोई रिस्क नहीं है।

स्विमिंग करते वक्त कॉन्टैक्ट लेंस नहीं लगाने चाहिए। मेकअप करते और उतारते वक्त कोशिश करें कि लेंस न पहने हों।

लेंस को हथेली पर रखकर सल्यूशन की मदद से रोजाना साफ करना जरूरी है। जब पहनें, तब भी साफ करें और जब निकालें, तब भी साफ करके ही रखें। अगर हर महीने लेंस बदल रहे हैं, तब भी रोजाना सफाई जरूरी है।

कुछ खास स्थितियों में ही डॉक्टर छोटे बच्चों को कॉन्टैक्ट लेंस बताते हैं, वरना जब तक बच्चे लेंस की देखभाल करने लायक न हो जाएं, तब तक उन्हें लेंस लगाने की सलाह नहीं दी जाती।

ऐसा कभी नहीं होता कि लेंस आंख में खो जाए या उससे आंख को कोई नुकसान हो। कई बार यह आंख में सही जगह से हट जाता है। ऐसे में आंख को बंद करें और धीरे-धीरे पुतली को हिलाएं। लेंस अपने आप अपनी जगह आ जाएगा।

कॉन्टैक्ट लेंस यूज करने वालों को अपने साथ चश्मा भी रखना चाहिए। आप जब चाहें, चश्मा लगा सकते हैं और जब चाहें, लेंस लगा सकते हैं।

सर्जरी
चश्मा हटाने के लिए आमतौर पर तीन-चार तरह के ऑपरेशन किए जाते हैं। कुछ साल पहले तक रेडियल किरटोटमी ऑपरेशन किया जाता था, लेकिन आजकल यह नहीं किया जाता। इससे ज्यादा लेटेस्ट तकनीक अब आ गई हैं। हम यहां चार तरह की सर्जरी की बात करेंगे। इन सभी में विजन 6/6 (परफेक्ट विजन) आ जाता है, लेकिन सबकी क्वॉलिटी अलग-अलग है। नंबर चाहे प्लस का हो या फिर माइनस का या फिर दोनों, सर्जरी के इन तरीकों से सभी तरह के चश्मे हटाए जा सकते हैं यानी मायोपिया और हाइपरोपिया दोनों ही स्थितियों को इन तरीकों से अच्छा किया जा सकता है।

कुछ में सर्जरी के बाद कुछ समस्याएं हो सकती हैं, तो कुछ एक निश्चित नंबर से ज्यादा का चश्मा हटाने में कामयाब नहीं हैं। ऐसे में डॉक्टर आंख की पूरी जांच करने के बाद ही यह सही सही-सही बता पाते हैं कि आपके लिए कौन-सा तरीका बेहतर है।

कौन करा सकता है सर्जरी
जिन लोगों की उम्र 18 साल से ज्यादा है और उनके चश्मे का नंबर कम-से-कम एक साल से बदला नहीं है, वे लेसिक सर्जरी करा सकते हैं।

अगर किसी शख्स की उम्र 18 साल से ज्यादा है लेकिन उसका नंबर स्थायी नहीं हुआ है, तो उसकी सर्जरी नहीं की जाती। सर्जरी के लिए एक साल से नंबर का स्थायी होना जरूरी है।

जिन लोगों का कॉर्निया पतला है, उन्हें ऑपरेशन की सलाह आमतौर पर नहीं दी जाती।

गर्भवती महिलाओं का भी ऑपरेशन नहीं किया जाता।

कितनी तरह की सर्जरी

सिंपल लेसिक
सिंपल लेसिक सर्जरी को पहले यूज किया जाता था, लेकिन अब डॉक्टर इसका इस्तेमाल नहीं करते। वजह यह है कि ऑपरेशन के बाद इसमें काफी जटिलताएं होने की आशंका बनी रहती है, मसलन आंखें चुंधिया जाना आदि। हालांकि इस तरीके से ऑपरेशन करने के बाद चश्मा पूरी तरह हट जाता है और नजर क्लियर हो जाती है। जहां तक खर्च का सवाल है, तो इसमें दोनों आंखों के ऑपरेशन का खर्च करीब 20 हजार रुपये आता है।

सी-लेसिक
इसे कस्टमाइज्ड लेसिक भी कहा जाता है। चश्मा हटाने के लिए किए जानेवाले ज्यादातर ऑपरेशन आजकल इसी तकनीक से किए जा रहे हैं। सिंपल लेसिक कराने के बाद आनेवाली तमाम दिक्कतें इसमें नहीं होतीं। इसे रेडीमेड और टेलरमेड शर्ट के उदाहरण से समझ सकते हैं - मतलब सिंपल लेसिक अगर रेडीमेड शर्ट है तो सी-लेसिक टेलरमेड शर्ट है। सिंपल लेसिक में पहले से बने एक प्रोग्राम के जरिए आंख का ऑपरेशन किया जाता है, जबकि सी-लेसिक में आपकी आंख के साइज के हिसाब से पूरा प्रोग्राम बनाया जाता है। कहने का मतलब हुआ कि सी लेसिक में आंख विशेष के हिसाब से ऑपरेशन किया जाता है, इसलिए यह ज्यादा सटीक है। जहां तक ऑपरेशन के बाद की आनेवाली दिक्कतों की बात है तो सी-लेसिक में वे भी बेहद कम हो जाती हैं। यह सिंपल लेसिक के मुकाबले ज्यादा सेफ और बेहतर है। खर्च दोनों आंखों का लगभग 30 हजार रुपये आता है।

तरीका : जिस दिन ऑपरेशन किया जाता है, उस दिन मरीज को नॉर्मल रहने की सलाह दी जाती है। इस ऑपरेशन में दो से तीन मिनट का वक्त लगता है और उसी दिन मरीज घर जा सकता है। ऑपरेशन करने से पहले डॉक्टर आंख की पूरी जांच करते हैं और उसके बाद तय करते हैं कि ऑपरेशन किया जाना चाहिए या नहीं। ऑपरेशन शुरू होने से पहले आंख को एक आई-ड्रॉप की मदद से सुन्न (ऐनस्थीजिआ) किया जाता है। इसके बाद मरीज को कमर के बल लेटने को कहा जाता है और आंख पर पड़ रही एक टिमटिमाती लाइट को देखने को कहा जाता है। अब एक स्पेशल डिवाइस माइक्रोकिरेटोम की मदद से आंख के कॉनिर्या पर कट लगाया जाता है और आंख की झिल्ली को उठा दिया जाता है। इस झिल्ली का एक हिस्सा आंख से जुड़ा रहता है। अब पहले से तैयार एक कंप्यूटर प्रोग्राम के जरिए इस झिल्ली के नीचे लेजर बीम डाली जाती हैं। लेजर बीम कितनी देर के लिए डाली जाएगी, यह डॉक्टर पहले की गई आंख की जांच के आधार पर तय कर लेते हैं। लेजर बीम डल जाने के बाद झिल्ली को वापस कॉनिर्या पर लगा दिया जाता है और ऑपरेशन पूरा हो जाता है। यह झिल्ली एक-दो दिन में खुद ही कॉनिर्या के साथ जुड़ जाती है और आंख नॉर्मल हो जाती है। मरीज उसी दिन अपने घर जा सकता है। टांके या दर्द जैसी कोई शिकायत नहीं होती। एक या दो दिन के बाद मरीज अपने सामान्य कामकाज पर लौट सकता है। कुछ लोग ऑपरेशन के ठीक बाद रोशनी लौटने का अनुभव कर लेते हैं, लेकिन ज्यादातर में सही विजन आने में एक या दिन का समय लग जाता है।

बाद में भी रखरखाव जरूरी : ऑपरेशन के बाद दो से तीन दिन तक आराम करना होता है और उसके बाद मरीज नॉर्मल काम पर लौट सकता है। स्विमिंग, मेकअप आदि से कुछ हफ्ते का परहेज करना होगा। जो बदलाव कॉर्निया में किया गया है, वह स्थायी है इसलिए नंबर बढ़ने या चश्मा दोबारा लगने की भी कोई दिक्कत नहीं होती, लेकिन कुछ और वजहों मसलन डायबीटीज या उम्र बढ़ने के साथ चश्मा लग जाए, तो बात अलग है।

ब्लेड-फ्री लेसिक या आई-लेसिक
सर्जरी की मदद से चश्मा हटाने का यह लेटेस्ट तरीका है। सिंपल लेसिक और सी-लेसिक में कॉर्निया पर कट लगाने के लिए एक माइक्रोकिरेटोम नाम के डिवाइस का इस्तेमाल करते हैं, लेकिन ब्लेड-फ्री लेसिक में इस कट को भी लेसर की मदद से ही लगाया जाता है। बाकी सर्जरी का तरीका सी-लेसिक जैसा ही होता है। अगर पावर ज्यादा है, कॉर्निया बेहद पतला है, तो ब्लेड-फ्री लेसिक कराने की सलाह दी जाती है। वैसे, ऐसे लोगों को इसे ही कराना चाहिए, जिन्हें एकदम परफेक्ट विजन चाहिए मसलन स्पोर्ट्समैन, शूटर आदि। दोनों आंखों के ऑपरेशन का खर्च 85 हजार रुपये तक आ जाता है। आई-लेसिक सर्जरी में शुरुआत के दिनों में कुछ दिक्कतें हो सकती हैं, मसलन आंख के सफेद हिस्से पर लाल धब्बे, जो दो से तीन हफ्ते में खत्म हो जाते हैं। आंखों में थोड़ा सूखापन हो सकता है और कम रोशनी में देखने में कुछ दिक्कत हो सकती है। कुछ समय बाद ये दिक्कतें अपने आप दूर हो जाती हैं।

लेंस इंप्लांटेशन यानी ICL
अगर चश्मे का नंबर माइनस 12 से ज्यादा है और कॉर्निया इतना पतला है कि आई-लेसिक भी नहीं हो सकता है, तो डॉक्टर चश्मा हटाने के लिए लेंस इंप्लांटेशन तकनीक का यूज करते हैं। इसमें आंख के अंदर इंप्लांटेबल कॉन्टैक्ट लेंस (आईसीएल) लगा दिया जाता है। आईसीएल बेहद पतला, फोल्डेबल लेंस होता है, जिसे कॉनिर्या पर कट लगाकर आंख के अंदर डाला जाता है। जिस मिकेनिजम पर कॉन्टैक्ट लेंस काम करते हैं, यह लेंस भी उसी तरह काम करता है। फर्क बस इतना है कि इसे आंख में पुतली (आइरिस) के पीछे और आंख के नेचरल लेंस के आगे फिट कर दिया जाता है, जबकि कॉन्टैक्ट लेंस को पुतली के ऊपर लगाया जाता है। इसमें एक बार में एक ही आंख का ऑपरेशन किया जाता है। पूरी प्रक्रिया में लगते हैं 30 मिनट और दूसरी आंख का ऑपरेशन कम-से-कम एक हफ्ते के बाद किया जाता है। ऑपरेशन होने के बाद मरीज उसी दिन घर जा सकता है और दो-तीन दिन के बाद ही नॉर्मल रुटीन पर आ सकता है।

नजर बेहतर बनाने के दूसरे तरीके

होम्योपैथी
होम्योपैथी में आमतौर पर ऐसे दावे नहीं किए जाते कि इससे मायोपिया (दूर की नजर कमजोर होना) का नंबर हट सकता है, फिर भी अगर नंबर कम है और समय रहते दवाएं लेनी शुरू कर दी जाएं तो होम्योपैथिक दवाएं नजर को बेहतर बनाने और चश्मे के नंबर को कम करने या टिकाए रखने में बहुत कारगर हैं।

चश्मे का नंबर कम करने के लिए फाइसोस्टिगमा 6 ( Physostigma ) या रस टॉक्स 6 ( Rhus.Tox ) की चार-चार गोली दिन में तीन बार लेने लें।

कई बार आंखों की मसल्स कमजोर हो जाने की वजह से भी नजर कमजोर होती है। अगर ऐसी स्थिति है तो मरीज को जेलसीमियम 6 ( Gelsemium ) या बेलाडोना 6 ( Belladonna ) की चार-चार गोली दिन में तीन बार लेनी चाहिए।

अगर चोट आदि के बाद नजर कमजोर हुई हो तो आर्निका 6 ( Arnica ) या बेलिस 6 ( Belles) की चार-चार गोली दिन में तीन बार लेनी चाहिए।

नोट : चूंकि यह इलाज लंबा चलता है, इसलिए ये सभी दवाएं कम पोटेंसी की ही दी जानी चाहिए। वैसे कोई भी दवा लेने से पहले अपने डॉक्टर से सलाह जरूर कर लें।

आयुर्वेद
आयुर्वेद में भी मायोपिया के केस का चश्मा पूरी तरह हटाने के केस न के बराबर मिलते हैं, लेकिन आंखों की रोशनी बढ़ाने के लिए आयुवेर्द में काफी कुछ है। इन दवाओं और नुस्खों के काफी अच्छे रिजल्ट भी देखने को मिले हैं।

खाने में दूध, आंवला, गाजर, पपीता, संतरा और अंकुरित अनाज जरूर शामिल करें।

मां बच्चे को अपना दूध अच्छी तरह पिलाती है तो बच्चे की नजर कमजोर होने के आसार कम हो जाते हैं।

खाना खाने के बाद आधा चम्मच भुनी सौंफ और मिश्री को चबाकर खाने से आंखों की परेशानियां नहीं होतीं।

आंखों की रोशनी बढ़ाने और आंखों की दूसरी दिक्कतों के लिए आयुवेर्द में दो दवाओं का यूज किया जाता है। ये हैं त्रिफला घृत और सप्तामृत लौह। इन दवाओं को सेवन वैद्य की सलाह से करें। ये दवाएं बचाव के तौर पर नहीं ली जातीं। बीमारी होने पर डॉक्टर की सलाह से ही इन्हें लेना चाहिए। चश्मे का नंबर लगातार बढ़ रहा है तो ये दवाएं कारगर हैं।

एक बूंद शहद में एक बूंद प्याज का रस मिलाकर हथेली पर रगड़ लें। सोने से पहले आंखों में काजल की तरह लगाएं।

खाने के बाद गीले हाथों को दोनों आंखों पर फेरें।

हफ्ते में दो दिन पैर के तलुए और सिर के बीचोबीच तेल की मालिश करने से आंखों की रोशनी बढ़ती है।

एक चम्मच गाय का घी, आधा चम्मच शक्कर और दो काली मिर्च का चूर्ण मिला लें। इसे रोज सुबह खाली पेट लें। बच्चों की आंखों की रोशनी बढ़ाने के लिए बहुत बढि़या नुस्खा है।

योग
जिन लोगों की नजर कमजोर है, उन्हें नीचे दी गई यौगिक क्रियाओं को करना चाहिए। इन क्रियाओं को अगर सामान्य नजर वाले लोग भी नियमित करें तो उनकी आंखों की रोशनी कमजोर नहीं होगी। सलाह यही है कि कोई भी क्रिया योग विशेषज्ञ से सीखकर ही करनी चाहिए।

आंखों के यौगिक सूक्ष्म व्यायाम (नेत्र-शक्ति विकासक क्रियाएं) नियमित करें। इसमें क्रमश: आंखों को ऊपर-नीचे, दायें-बायें घुमाएं। इसके बाद दायें से बायें और बायें से दायें गोलाकार घुमाएं। हर क्रिया पांच से सात बार कर लें।

सूर्य नमस्कार 6 से 12 बार तक कर सकते हैं।

कपालभाति, भस्त्रिका, अनुलोम विलोम, भ्रामरी और उद्गीत प्राणायाम (ओम जाप) खासतौर से फायदा पहुंचाते हैं।

शुद्धि क्रियाओं में जलनेति, दुग्धनेति और घृतनेति कुछ दिन तक नियमित करने से नेत्र ज्योति में चमत्कारिक परिणाम मिलते हैं। इन क्रियाओं को किसी योग विशेषज्ञ से सीखकर ही करें।

ये योगासन आंखों की रोशनी बढ़ाते हैं : सर्वांगासन, मत्स्यासन, पश्चिमोत्तानासन, मंडूकासन, शशांकासन और सुप्तवज्रासन।

शुद्ध शहद या गुलाब अर्क आंखों में नियमित डालने से भी नेत्र ज्योति बढ़ती है।

त्रिफला को रात को भिगोकर रख दें। सुबह उसके जल को छान लें और उससे आंखें धोएं।

बच्चों को छह साल की उम्र के बाद योग करवाया जा सकता है, लेकिन आंखों की सूक्ष्म क्रियाएं छह साल से पहले भी शुरू कराई जा सकती हैं।

Thursday, December 9, 2010

राजनीति में‘भोर’की आहट‘भारतीय गरीब हैं, पर भारत गरीब देश नहीं है’



अखबारों की खबरें, अगर सही हैं, तो बिहार की राजनीति में एक नयी संभावना की आहट है.बिहार से अधिक, भारत की दरुगध देती राजनीति के समानांतर, बिहार से ही पूरे मुल्क के लिए एक उम्मीद भरी सुबह की शुरुआत की तैयार पृष्ठभूमि के संकेत. बिहार, जो पूरे देश में व्यंग्य, हास्य और कटु बातों का पर्याय था, वही देश की राजनीति मेंमानकबनने की उम्मीद जगा रहा है.

अगर यह हो गया, तो यह मुहावरा नये सिरे से लिखा जायेगा, कि बंगाल, जो आज सोचता है, देश कल. हालांकि अंगरेजों के जमाने का यह कथन, बहुत पहले अपना रेलिवेंस (प्रासंगिकता) खो चुका है.एक नयी शुरुआत के संकेत कहां से है?इन खबरों में!(1) बंद हो सकता है, एमएलए फ़ंड?(2) भ्रष्टाचार के खिलाफ़ जंग.(3) लोक सेवा पाने का हक.(4) सासंद-विधायक देंगे संपत्ति का ब्योरा.

एमपी या एमएलए फ़ंड
, भारतीय राजनीति की एक गंभीर बीमारी (भ्रष्टाचार का कैंसर) का सबसे दागदार प्रतीक है. देश में कहीं चले जाइए, जनता की लोक मान्यता है कि खांटी ईमानदार भी घर बैठे-बैठे 20 फ़ीसदी, इस कोष से पाते हैं. यह गलत है. आज भी यह संवाददाता, अनेक ईमानदार राजनेताओं की सूचना रखता है, जो इस फ़ंड से एक धेला भी नहीं छूते. राजनीति मेंभोर..हालांकि ऐसे लोग अब राजनीति में अपवाद हैं.

पर मार्केटिंग के इस दौर में माना जाता है कि
परसेप्शन इज रियलिटी(बोध या धारणा ही सच है). यह मान लिया गया है कि एमपी-एमएलए फ़ंड, भ्रष्टाचार की संस्कृति का स्र्ोत है. याद करिए, इसकी शुरुआत? पूत के पांव पालने में ही पहचाने जाते हैं? नरसिंह राव की सरकार को लोकसभा में बहुमत सिद्ध करना था.

1991-1996 का दौर. पहली बार तब सांसद घूस कांड हुआ. सरकार बचाने के लिए सांसदों की खरीद-फ़रोख्त की पहली घटना, भारतीय लोकतंत्र में.उसी सरकार के मौलिक चिंतन या सांसदों को खुश रखने की योजना से ही इसकी शुरूआत.आज झारखंड में एक विधायक तीन करोड़ तक खर्च कर सकता है. विधायक फ़ंड से. पहले दो करोड़ था, मधु कोड़ा कार्यकाल में एक करोड़ और बढ़ा. झारखंड की राजनीति के स्तर बताने की जरूरत नहीं.

इस सांसद-विधायक फ़ंड ने
, राजनीति के सतीत्व (ईमानदारी) पर सवाल उठा दिया है? इसने पवित्र और धवल राजनीति के चादर पर सबसे गहरा दाग छोड़ा है. इसे नकारते सभी हैं. कुछ ही दिनों पहले लालू जी ने भी कहा था कि एमएलए फ़ंड से अब कार्यकर्ता नहीं, ठेकेदार उपजते हैं. पिछले 15 वर्षो में केंद्र से लेकर अनेक राज्यों के ईमानदार राजनेता (सभी दलों के) इसे कोसते रहे हैं.

ठेठ बनारसी लफ्ज में कहें
, तो इसे कबाहट (सिरदर्द देनेवाली चीज) मानते रहे हैं, पर कोई साहस नहीं कर सका, इसे हटाने या इसके स्वरूप को बदलने के लिए? बिहार की राजनीति में इसे हटाने यह इसके स्वरूप को बदलने की सुगबुगाहट है, यह उम्मीद पैदा करनेवाला कदम होगा. इस अर्थ में बिहार की राजनीति, देश को राह दिखायेगी. जो राजनीति व्यवसाय-धंधा का प्रतीक बन गयी है, उसकी साख लौटाने का यह प्रस्थान (मानक) बिंदु होगा.

अंतत: राजनीति ही देश या समाज को शिखर पर पहुंचा सकती है
, कोई और विधा नहीं. उस राजनीति का चीरहरण करने में इसफ़ंड योजना की कारगर भूमिका रही है. इससे दलों में कार्यकर्ताओं का पनपना-जनमना बंद हो गया. ठेकेदार बननेवालों की स्पर्धा शुरू हो गयी. बिचौलिये या ठेकेदार, नयी राजनीतिक संस्कृति के जन्मदाता हो गये. ठेकेदार नाराज, तो ईमानदार राजनेता के भविष्य पर प्रश्न चि: लगने लगा? यह योजना लांछन की प्रतीक बन गयी.

इस लांछन से मुक्ति की पहल
, बिहार से हो, तो एहसास करिए देश की मौजूदा राजनीति पर इसका क्या दबाव होगा? मनोवैज्ञानिक, नैतिक और मुद्दे की गंभीरता को लेकर. बिहार ने इसे खत्म करने की पहल की, तो पूरे देश की राजनीति में यह निर्णायक सवाल बनेगा. कारण जनता में भ्रष्टाचार के खिलाफ़ आग है.

विस्फ़ोटक आक्रोश है. नहीं समझ आये
, तो गैर राजनीतिक बाबा रामदेव की सभाओं की भीड़ जाकर देखें. उसके मूड को परखें. इस मुद्दे पर जनता एक तरफ़, नेता दूसरी तरफ़. बिहार प्रो-पीपुल कदम उठा कर, देश के सभी दलों को, पूरी राजनीति के मौजूदा व्याकरण को बदलने की पृष्ठभूमि तैयार कर देगा. यह कदम उठानेवाले बिहार के सभी विधायक, बिहार समेत अपने लिए यश और कीर्ति का नया अध्याय लिखेंगे.

राजनीति के इतिहास में बिहार स्मरण किया जायेगा.भ्रष्टाचार के खिलाफ़ मोरचा खोलने का सरकारी निर्णय भी दूरगामी असर पैदा करनेवाला है. पिछले कुछेक महीनों से एक एसएमएस खूब घूम रहा है.
अंगरेजी में. भावार्थ हैभारतीय गरीब हैं, पर भारत गरीब देश नहीं है, यह कहना है, स्विस बैंक के एक डाइरेक्टर का. उनके अनुसार 280 लाख करोड़ भारतीय मुद्रा, स्विस बैंकों में जमा है.

इसका उपयोग कर
30 वर्षो तक कररहित बजट बन सकता है. 60 करोड़ भारतीयों को इस राशि से नौकरी मिल सकती है. देश के किसी गांव से दिल्ली तक चार लेन की सड़क बन सकती है. हमेशा के लिए 500 सामाजिक योजनाओं को मुफ्त बिजली दी जा सकती है. 60 वर्षो तक हर नागरिक को 2000 प्रतिमाह भुगतान किया जा सकता है.

वर्ल्ड बैंक
, आइएमएफ़ लोन की जरूरत नहीं. सोचिए, किस तरह हमारा धन, धनी राजनेताओं द्वारा कैद (ब्लाक) है. भ्रष्ट राजनेताओं के खिलाफ़ हमारा पूरा फ़र्ज है. इस एमएमएस (संदेश) को इतना भेजें कि पूरा भारत पढ़े.इस एमएमएस की शुरुआत कब से हुई? नवंबर 2010 में एक रिपोर्ट जारी हुई. ग्लोबल फ़ाइनेंशियल इंटीग्रिटी (सपोर्टेड बाइ फ़ोर्ड फ़ाउंडेशन). तैयार करनेवाले हैं देवकर. रिपोर्ट का नाम है, द ड्राइवर्स एंड डायनामिक्स ऑफ़ इलिसिट फ़ाइनेंशियल फ्लोज फ्राम इंडिया 1948 टू 2008.
इस रपट की पांच बातों पर गौर करें
1.ग्लोबल फ़ाइनेंशियल इंटीग्रिटी की रिपोर्ट के मुताबिक 1948-2008 के बीच भारत का विदेशी बैंको में कुल 20 लाख करोड़ रुपये कालेधन के रूप में जमा है. रिपोर्ट के मुताबिक कालेधन का प्रवाह 11.7 फ़ीसदी सालाना का दर से बढ़ा है.
2. यह रकम 2 जी स्पेक्ट्रम मामले में हुए नुकसान का 12 गुणा अधिक है.
3. स्विस बैंक एसोशिएशन 2008 की रिपोर्ट के अनुसार भारतीयों के स्विस बैंक में 66,000 अरब रुपये(1500 बिलियन डालर) जमा है. रूस के 470 बिलियन डालर, ब्रिटेन के 390 बिलियन, यूक्रेन के 100 बिलियन, जबकि अन्य देशों का कुल 300 बिलियन डालर है.
4. कार एंड कार्टराइट स्मिथ की 2008 की रिपोर्ट के मुताबिक 2002-06 के दौरान कालेधन के कारण भारत को सालाना 23.7-27.3 बिलियन डालर का नुकसान उठाना पडा है.
5. आइएमएफ़ की रिपोर्ट के मुताबिक 2002-06 के दौरान भारत को कालेधन के कारण 16 बिलियन डॉलर सालाना का नुकसान हुआ है.इस रिपोर्ट को हर भारतीय को पढ़ना चाहिए.

कैसे वर्ष
1948 से 2008 तक भारत से कालाधन बाहर गया? काले अंग्रेजों ने कैसे भारतीयों को लूटा? चंगेज, नादिरशाह या बाहरी लुटेरों से भी अधिक क्रूरता और बेदर्दी से? इसी तरह जैसे 2जी प्रकरण के सभी टेपों को पुस्तकाकार के रूप में छाप कर किसी देशभक्त को हर भारतीय को बंटवा देना चाहिए, ताकि हर भारतीय मीडिया से लेकर शासक वर्ग के हर अंग (नेता, अफ़सर, उद्यमी) की हकीकत समझ सके. लॉबिस्ट सांसदों या राजनीति का असली चरित्र खुद पढ़-सुन सके.

यह बताने या याद कराने की जरूरत नहीं कि प्रभात खबर ने कैसे
2009 के लोकसभा चुनावों में स्विस बैंक में जमा भारतीय काला धन का मुद्दा उठाया था. अनेक तथ्यों के साथ. तब यह देशव्यापी चर्चा का विषय बना, पर फ़िर चुप्पी. अब इस रिपोर्ट ने दुखते रग पर हाथ डाल दी है. सरकार चुप नहीं रह सकती. खबर आयी है कि काले धन के अध्ययन की कमिटी बन रही है.

14 देशों तक इसके पसरे जाल की जांच चलेगी. केंद्र सरकार के ये कदम, टालू लगते हैं. इसलिए बाबा रामदेव की हुंकार पर लोग जग रहे हैं. यह बात भी उठ रही है कि एक तरफ़ भारत का इतना धन बाहर है. दूसरी ओर केंद्रीय सांख्यिकी संगठन (सी.एस.ओ) के आंकड़े के अनुसार हर भारतीय पर 38,000 रुपये का कर्ज है? इस विसंगति का जवाब लोग मांगेंगे? एक नये राजनीतिक स्वर या चिंतन के तहत ही. बिहार की सुगबुहाट मंच बन सकती है.

याद करिए
, जब-जब भ्रष्टाचार का मामला उठा है, जनता एक हुई है.74 आंदोलन, 77 के चुनाव. 1998 में बोफ़ोर्स का प्रकरण. 2जी, कामनवेल्थ घोटाला, आदर्श सोसाइटी प्रकरण वगैरह से देश की राजनीति से बदबू आने लगी है.राडिया प्रकण के खुलासे से रही-सही बातें पूरी हो गयी हैं. इस टेप में कहीं चर्चा है कि एक राष्ट्रीय शासक दल को एक बड़ा घराना, घरेलू (घर की बात) कहता है.बिहार में भ्रष्टाचार नियंत्रण के लिए कानून बना है.

देश के इस परिवेश-माहौल में इस कानून का ईमानदार क्रियान्वयन एक नया माहौल बनायेगा. बिहार में ही नहीं
, देश में भ्रष्टाचार, छल, कपट और षड्यंत्र की राजनीति का बोलबाला है. दिल्ली पूरी तरह इसके गिरफ्त में है.शासन या सत्ता, चाहे जिसका हो. इस भ्रष्टाचार के खिलाफ़ बिहार की यह पहल, दुनिया की निगाह खींचेगी. पिछले दिनों, बिहार चुनाव परिणाम के बिश्लेषण दुनिया के मशहूर अखबारों में छपे. विख्यात स्तंभकारों ने अंग्रेजी के हर बड़े अखबार में लिखा, बिहार पर.इतिहासकार रामचंद्र गुहा ने भी हाल में लिखा.

द टेलिग्राफ़ में. हर बिहारी-झारखंडी को इन लेखों को पढ़ना चाहिए.भारतीय राजनीति में सुधार अब दिल्ली से संभव नहीं. अगर एक राज्य में सुधार हुए, तो उसके देशव्यापी असर होंगे. बिहार यह प्रयोगस्थली बन सकता है. रामचंद्र गुहा भी यह मानते हैं.

कहावत है
सीइंग इज बिलिविंग (देखना ही प्रमाण है). अर्थशास्त्र में एक लफ्ज है, डिमांस्ट्रेटिव इंपैक्ट (नमूने या प्रयोग का असर). फ़र्ज कीजिए कि बिहार के कानून के तहत भ्रष्टाचारियों की संपत्ति जब्त होती है, फ़ास्टट्रैक कोर्ट में ट्रायल होता है, यह सब पूरा देश देखेगा, तो क्या होगा? इसका प्रभाव व दबाव अनंत-असीमित होगा. समाजशास्त्र की नजर में समाज खेमे में बंटेगा,हैव व हैव नाट, फ़िर, भ्रष्ट, बेईमान बनाम ईमानदार के बीच.

साम्यवाद की भाषा में बुर्जुआ बनाम सर्वहारा के बीच. भारतीय राजनीति में जिस तरह गरीबी हटाओ
, मंडल, कमंडल ने ध्रुवीकरण पैदा किया था, उससे भी तीखा, प्रभावी और धारदार मुद्दा है, यह. बिहार के लिए ही नहीं. देश के लिए. शत्र्त यही है कि इसका ईमानदार क्रियान्वयन हो. भारतीय राजनीति में संभावनाओं के नये द्वार खोलनेवाला, यह कानून. हाल मेंद हिंदूके एक लेख में यह बात उभरी कि91 के उदारीकरण के बाद भारत में भ्रष्टाचार बहुत बढ़ा है.

ज्वार-भाटा की तरह. बिहार की राजनीति अश्वमेध के घोड़े की भूमिका में सक्रिय भ्रष्टाचार की बाग थाम ले या इस कालिया नाग को नाथने की शुरूआत कर दे
, तो देखिए देश की राजनीति में क्या बदलाव होते हैं? फ़र्ज करिए कि यहां के विधायक, मंत्री, सांसद, अफ़सर हर वर्ष संपत्ति की सार्वजनिक घोषणा करते हैं, तो इसका क्या असर होगा? कानून तो अब भी है. आयकर का कानून है.

चुनाव आयोग का कानून. पर सही क्रियान्वयन कहां है
? सही अर्थ में बिहार से अगर नयी शुरूआत होती है, तो देश की राजनीति में इसका असर होगा. यह सूचना का युग है. ज्ञान का दौर है. यहां लोकसेवा कानून हो जाये, इन चीजों की सही और ईमानदार शुरूआत हो जाये, तो फ़िर दृश्य दिखेंगे.भारतीय मानस, ईमानदार राजनीति की प्रतीक्षा में है. बाहर और अंदर के खतरों से घिरा है, देश और रहनुमा हैं काजल की कोठरी में? यह स्थिति मुल्क की है. मुल्क नयी राजनीति, नये राजनीतिक मूल्यों और संस्कृति की तलाश में है.बिहार के प्रयोग संभावनाओं से भरे हैं.चाहिए सिर्फ़ सही क्रियान्वयन।

शर
हरिवंश